रायपुर। श्री रावतपुरा सरकार यूनिवर्सिटी, रायपुर के द्वारा आज “भारतीय ज्ञान परंपरा ” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता माननीय प्रो. गणेशी लाल, जी, राज्यपाल, ओडिशा रहें ।विशिष्ट वक्ता के रूप में यूनिवर्सिटी के माननीय प्रति-कुलाधिपति श्री राजीव माथुर जी रहें एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता यूनिवर्सिटी के माननीय कुलपति प्रो. (डॉ.) राजेश कुमार पाठक जी ने किया. वेब संगोष्ठी में विषय प्रवर्तन एवं संचालन कर रहे प्रो. (डॉ.)शोभना झा अधिष्ठाता, कला. संकाय ने सभी वक्ता एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि ज्ञान परंपरा में जड़त्व नहीं अपितु सतत प्रवाहमान है, इसमें विवेक के उपयोग की स्वतंत्रता है। कार्यक्रम के मुख्यवक्ता वक्ता माननीय प्रो. गणेशी लाल, जी ने कहा कि शुद्ध अनीश्वरवादी भौतिकवाद से लेकर शुद्ध अद्वैतवाद तक अनेक संभावनाओं और बहुआयामी संवाद का नाम ही भारतीय ज्ञान परंपरा है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देश भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अपनाने और जानने जोर देने लगे हैं। वेदों उपनिषदों, स्मृतियों और यहाँ की जीवन शैली को जानने के लिए शोध किए जा रहें हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने दर्शन, भाषा विज्ञान, अनुष्ठान, व्याकरण, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद,ज्योतिष जैसे क्षेत्रों में विश्व कल्याण के लिए अनेक आयामों को स्थापित किया है। राजपाल महोदय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। इस ज्ञान परंपरा में आधुनिक विज्ञान प्रबंधन सहित सभी क्षेत्रों के लिए अदभुत खजाना है। भारतीय दृष्टिकोण से ही ज्ञान परंपरा का अध्ययन कर हम एक बार फिर विश्व गुरु बन सकते हैं। यूनिवर्सिटी के माननीय प्रति-कुलाधिपति श्री राजीव माथुर जी ने कहा कि किसी भी सभ्यता और संस्कृति का उत्थान और पतन उसकी आर्थिक स्थिति और राजनितिक स्थिति नहीं होती बल्कि ज्ञान परंपरा होती है. भारतीय संस्कृति ने हमेशा ही ज्ञान परंपरा को महत्त्व दिया है. उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान को समृद्ध करने में गुरुकुल परंपरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण परंपरा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य छात्रों का नैतिक चरित्र का निर्माण कारण था जिनसे उनमें अच्छे संस्कारों का निर्माण हो सकें साथ ही सामाजिकता,आत्मसम्मान, सहनशीलता, परोपकार जैसे विभिन गुणों का विकास किया जाता था।

माननीय कुलपति प्रो. (डॉ.) राजेश कुमार पाठक जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की यह सनातन परंपरा अनादिकाल से है। वह तक्षशिला हो, नालंदा हो या विक्रमशिला विश्वविद्यालय सभी ज्ञान केंद्रों में यह परंपरा जड़ी रही है, इसलिए वैदिक काल से ही भारत की ज्ञान परंपरा उच्‍च स्तरीय रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय दृष्टिकोण को विकसित करने की जरूरत है। शिक्षा में भारतीय पुरातन ज्ञान परंपरा व संस्कृति के समावेश के नजरिये से यह संगम मात्र विकल्प नहीं है, बल्कि इस दिशा में सच्‍चा प्रयास है। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा कला संस्कृति, दर्शन, समाज शास्त्र, विज्ञान व प्रबंधन समेत विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक दृष्टिकोण देती है। हमें इस दृष्टिकोण को शिक्षा के क्षेत्र में अपनाकर राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया को और मजबूत बनाना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के नैतिक आयामों द्वारा मानवता के कल्याण हेतु निर्देशित नैतिक मूल्यों का संवर्धन एवं अनुगमन करने से ही विश्व-कल्याण होना संभव है। इससे वतमान युग की अनेकानेक समस्याओं का निवारण किया जा सकता है। उक्त कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राधिका चंद्राकर, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर योग विभाग द्वारा किया गया । संगोष्ठी में देश के विभिन्न प्रांतों से लगभग 500 से अधिक प्रतिभागी जुड़े हुए थे। यह वेब संगोष्ठी जूम ऐप के माध्यम से संचालित हुई। इस संगोष्ठी का प्रसारण अन्य विश्वविद्यालयों के फेसबुक पेज सहित विभिन्न शैक्षणिक संगठनों के सोशल मीडिया पर भी किया गया। इस अवसर पर प्रदेश व अन्य राज्यों के महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं यूनिवर्सिटी परिवार के प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रीय सहभागिता रहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed

Subscribe To Our Newsletter

[mc4wp_form id="69"]