दवाओं में है इंट्रेस्ट तो 12वीं के बाद ये कोर्स हैं आपके लिए बेस्ट ।

रायपुर, 14 जुलाई 2020

हाल ही में 12वीं पास करने वाले स्टूडेंट्स के लिए फार्मेसी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर बेहतर करियर बनाने का विकल्प मौजूद है। लेकिन जो छात्र ये नहीं जानते हैं कि फार्मेसी कोर्स क्या हैं और इसे करने के बाद क्या-क्या करियर विकल्प उपलब्ध रहते हैं, उनके लिए ये आर्टिकल बहुत मदद करेगा।

फार्मेसी क्या है। इस सवाल का आसान सा जवाब है कि दवाई, मेडिकल और स्वास्थ्य उपकरणों से जिसका संबंध हैं वही फार्मेसी है। फार्मेसी में तीन तरह के कोर्स होते हैं।

पहला है बी.फार्मा (B.Pharma) जिसे बैचलर ऑफ फार्मेसी कहा जाता है।

दूसरा है एम. फार्मा ( M.Pharma) जिसे मास्टर ऑफ फार्मेसी कहा जाता है।

तीसरा है डी.फार्मा (D. Pharma) जिसे डिप्लोमा इन फार्मेसी कहा जाता है।

सबसे पहले बी.फार्मा (B.Pharma) के बारे में चर्चा करते हैं।

  1. बी.फार्मा (B.Pharma)

बी.फार्मा फार्मेसी फील्ड की अंडर ग्रेजुएट डिग्री होती है। जिन छात्रों को मेडिकल फील्ड में रुचि है वो 12वीं साइंस (PCB) के बाद इसमें प्रवेश ले सकते हैं।

बी.फार्मेसी में दवाईयों से जुड़े अलग-अलग विषय होते हैं। जिनमें दवा कैसे बनती हैं। दवाईयों को बनाने में कौन-कौन से घटक शामिल होते हैं। कौन सी दवा किस बीमारी के लिए इस्तेमाल होती है। दवाओं का लैब में परीक्षण कैसे होता है। एक शब्द मे कहा जाए तो बी. फार्मा दवाईयों से जुड़ा कोर्स है।

अनिवार्य योग्यता :

जो स्टूडेंट्स बी.फार्मा कोर्स में दाखिला लेना चाहते हैं, उनको 12वीं साइंस फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलॉजी विषय के साथ 50 फीसदी अंकों में पास होना जरूरी है। बी.फार्मेसी कोर्स 4 साल का होता है। बी. फार्मा करने के बाद छात्र फार्मासिस्ट या केमिस्ट के तौर पर काम कर सकते हैं। छात्र फार्मास्यूटिकल कंपनी में काम कर सकते हैं।

  • एम.फार्मा ( M.Pharma)  –

जो छात्र बैचलर ऑफ फार्मेसी कोर्स कर लेते हैं वो आगे चलकर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए एम. फार्मा कर सकते हैं। एम. फार्मा कोर्स 2 साल का पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स होता है। मास्टर ऑफ़ फार्मेसी के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए छात्रों की दिमागी विश्लेषण (Brain analysis) क्षमता (capacity) अच्छी होनी चाहिए तथा दवाइयों (Medicines) के प्रति रूचि होनी चाहिए।

अनिवार्य योग्यता :

एम.फार्मा कोर्स करने के लिए स्टूडेंट्स को किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से  50% अंकों के साथ मास्टर ऑफ़ फार्मेसी या समकक्ष योग्यता होनी अनिवार्य होती है. मास्टर ऑफ़ फार्मेसी कोर्स 2 साल का होता है जिसमे चार सेमेस्टर होते हैं.

एम.फार्मा यानी मास्टर ऑफ़ फार्मेसी कोर्स करने के बाद छात्रों को अनेक स्थानों में आसानी से जॉब मिल जाती है. क्योंकि आजकल मेडिकल क्षेत्र में काफी विस्तार (Expand) हो गया है जिसके कारण इस क्षेत्र में रोजगार बनाने के अच्छे अवसर मिल जाते हैं.

  • हेल्थ सेंटर्स
  • हॉस्पिटल
  • एजुकेशनल इंस्टिट्यूट्स
  • क्लीनिकल
  • रिसर्च एजेंसीज
  • मेडिकल डिस्पेंसिंग स्टोर
  • सेल्स एंड मार्केटिंग डिपार्टमेंट
  • डी. फार्मा (D.Pharma)

डी. फार्मा को डिप्लोमा इन फॉर्मेसी (Diploma in Pharmacy) कहा जाता है। यह फार्मेसी विज्ञान का बहुत प्रचलित कोर्स है। डी. फार्मा  दवाओं की मैन्यूफैक्चरिंग, मार्केटिंग, दवाओं की क्वालिटी, स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन का विज्ञान है। आजकल हेल्थ केयर मार्किट में Pharmacy expert की काफी डिमांड है। D Pharma 2 वर्ष का कोर्स होता है।

अनिवार्य योग्यता :

इस कोर्स के लिए आवश्यक योग्यता PCM या PCB विषय से 12वीं पास होना जरूरी है। डी. फार्मेसी कोर्स के बाद आप फार्मासिस्ट के तौर पर आसांनी से जॉब पा सकते हैं। Pharmacy Sector में आप प्राइवेट और सरकरीं दोनों क्षेत्रों में जॉब करने का मौका पा सकते हैं। फार्मासिस्ट के तौर पर आप मेडिकल स्टोर, हॉस्पिटल, क्लिनिक, नर्सिंग होम, ड्रग मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में काम करने के अनेक अवसर मिलते हैं। इसके साथ ही  डी. फार्मा कोर्स के बाद आप खुद का मेडिकल स्टोर भी चला सकते हैं। या फिर आप चाहें तो मेडिकल एजेंसी की भी शुरआत कर सकते हैं। समय- समय पर गवर्नमेंट सेक्टर में डी. फार्मा के स्टूडेंट्स के लिये जॉब के विज्ञापन निकलते रहते हैं। आप इनमें अप्लाई करके सरकारी क्षेत्र में काम करने का अवसर पा सकते हैं।

फार्मेसी कोर्स के बाद स्कोप

हॉस्पिटल फार्मेसी, क्लिनिकल फार्मेसी, टेक्निकल फार्मेसी, रिसर्च एजेंसीज, मेडिकल डिस्पेंसिंग स्टोर, सेल्स ऐंड मार्केटिंग डिपार्टमेंट, एजुकेशनल इंस्टिट्यूट्स, हेल्थ सेंटर्स, मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव, क्लिनिकल रिसर्चर, मार्किट रिसर्च ऐनालिस्ट, मेडिकल राइटर, ऐनालिटिकल केमिस्ट, फार्मासिस्ट, ऑन्कॉलजिस्ट, रेग्युलेटरी मैनेजर

फार्मासूटिकल्स फील्ड में करियर ऑप्शंस
रिसर्च ऐंड डिवेलपमेंट: फार्मासूटिकल्स के क्षेत्र का दायरा भी काफी व्यापक है। यहां नई-नई दवाइयों की खोज व विकास संबंधी कार्य किया जा सकता है। आरऐंडडी क्षेत्र को जेनेरिक उत्पादों के विकास, ऐनालिटिकल आरऐंडडी, एपीआई (ऐक्टिव फार्मासूटिकल इन्ग्रेडिएंट्स) या बल्क ड्रग आरऐंडडी जैसी श्रेणियों में बांटा जा सकता हैं। इन सबका अपना सुपर-स्पेशलाइजेशन है।

ड्रग मैन्युफैक्चरिंग
यह इस फील्ड की अहम शाखा है। इस क्षेत्र में मॉलिक्युलर बायॉलजिस्ट, फार्मेकॉलजिस्ट, टॉक्सिकॉलजिस्ट या मेडिकल इंवेस्टिगेटर बन सकते हैं। मॉलिक्युलर बायॉलजिस्ट जीन संरचना और मेडिकल व ड्रग रिसर्च में प्रोटीन के इस्तेमाल का अध्ययन करता है। फार्मेकॉलजिस्ट इंसान के अंगों व ऊतकों पर दवाइयों के प्रभाव का अध्ययन करता है। टॉक्सिकॉलजिस्ट दवाओं के नेगेटिव इफेक्ट को मापने के लिए टेस्टिंग करता है। मेडिकल इंवेस्टिगेटर नई दवाइयों के विकास व टेस्टिंग की प्रक्रिया से जुड़ा होता है।

फार्मासिस्ट
हॉस्पिटल फार्मासिस्ट्स पर दवाइयों और चिकित्सा संबंधी अन्य सहायक सामग्रियों के भंडारण, स्टॉकिंग और वितरण का जिम्मा होता है, जबकि रिटेल सेक्टर में फार्मासिस्ट को एक बिजनेस मैनेजर की तरह काम करते हुए दवा संबंधी कारोबार चलाने में समर्थ होना चाहिए।

क्लिनिकल रिसर्च
इसके तहत नई लॉन्च मेडिसिन के बारे में रिसर्च होती है कि वह कितनी सुरक्षित और असरदार है। इसके लिए क्लिनिकल ट्रॉयल होता है। देश में कई विदेशी कंपनियां क्लिनिकल रिसर्च के लिए आ रही हैं। दवाइयों की स्क्रीनिंग संबंधी काम में नई दवाओं या फॉर्मुलेशन का पशु मॉडलों पर परीक्षण करना या क्लिनिकल रिसर्च करना शामिल है।

क्वॉलिटी कंट्रोल
फार्मासूटिकल इंडस्ट्री का यह एक अहम कार्य है। नई दवाओं के संबंध में अनुसंधान व विकास के अलावा यह सुनिश्चित करने की भी जरूरत होती है कि इन दवाइयों के जो नतीजे बताए जा रहे हैं, वे सुरक्षित, स्थायी और आशा के अनुरूप हैं।

ब्रैंडिंग ऐंड सेल्स
फार्मेसी की डिग्री के बाद स्टुडेंट ड्रग्स व मेडिसिन के सेल्स ऐंड मार्केटिंग में करियर बना सकता है। मार्केटिंग प्रफेशनल्स उत्पाद की बिक्री के अलावा बाजार की प्रतिस्पर्धा पर भी नजर रखते हैं कि किस प्रॉडक्ट के लिए बाजार में ज्यादा संभावनाएं हैं, जिसके मुताबिक प्लानिंग की जाती है।

मेडिकल इन्वेस्टिगेटर

यह नई दवाइयों के टेस्टिंग व डिवेलपमेंट की प्रक्रिया से रिलेटिड है। हॉस्पिटल फार्मासिस्ट पर मेडिसिन व अन्य मेडिकल रिलेटिड सामग्रियों के स्टॉकिंग और डिस्ट्रिब्यूशन का जिम्मा होता है। रिटेल सेक्टर में फार्मासिस्ट को बिजनस मैनेजर की तरह काम करते हुए दवा संबंधी कारोबार करना होता है।

रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट
विदेशों में फार्मासिस्ट को रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट कहा जाता है। जिस तरह डॉक्टरों को प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस की जरूरत होती है, उसी तरह इन्हें भी फार्मेसी में प्रैक्टिस करने के लिए लाइसेंस चाहिए। उन्हें रजिस्ट्रेशन के लिए एक टेस्ट पास करना होता है। फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस विषय में ट्रेनिंग के लिए ‘फार्मा डी’ नामक एक छह साल का कोर्स शुरू किया है।

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