30 जनवरी 1948, गांधी की शहादत के 72 वर्ष और गोडसे की वो तीन गोलियां।

संपादकीय, 30 जनवरी 2020

30 जनवरी 1948 का वो दिन अन्य दिनों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही गहमागहमी भरा हुआ था। दिल्ली में सूरज नहीं निकला था। कोहरे और जाड़े के कारण सड़कों पर दिल्लीवाले ज़्यादा दिखाई नहीं दे रहे थे। लेकिन बिड़ला हाउस जिसे अब गांधी स्मृति भवन कहा जाता है, में कुछ खास हलचल नहीं थी, रोजाना की तरह 30 जनवरी 1948 को भी शाम 5 बजे वहां प्रार्थना सभा होनी थी, जिसमें गांधीजी को आना था। रोजाना गांधीजी ठीक 5 बजकर 10 मिनट पर प्रार्थना सभा के लिए पहुंच जाते थे, लेकिन उस दिन कुछ देरी से पहुंचे।

उस दिन सरदार पटेल बिड़ला हाउस पहुंचे थे और सीधे गांधीजी के पास पहुंचे। उन्होंने गांधी से कहा कि काठियावाड़ से आए दो लोग आपसे मिलना चाहते हैँ। इस पर बापू ने कहा कि उन्हें रोक लो, ‘अगर ज़िंदा रहा तो प्रार्थना के बाद उनसे मिलूंगा.’

 दोपहर साढ़े तीन बजे से ही महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा की रिकॉर्डिंग के लिए आकाशवाणी के कर्मचारी बिड़ला हाउस में मौजूद थे। बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा की शुरुआत सितंबर 1947 से हुई थी। प्रार्थना सभा के बाद गांधीजी मिलने आए लोगों से मुलाकात करते थे और समसामयिक मुद्दों पर अपनी राय देते थे।

 30 जनवरी 1948 को गांधीजी प्रार्थना सभा के लिए 5 बजकर 10 मिनट पर न पहुंचकर 5 बजकर 16 मिनट पर प्रार्थना स्थल पर पहुंचे। उस वक्त गांधी की उम्र 78 वर्ष थी। बढ़ती उम्र और कमजोर स्वास्थ्य की वजह से वो अपने दोनों हाथ मनु और आभा के कंधों पर टिकाकर चल रहे थे। ठीक 5 बजकर 17 मिनट पर धांय की आवाज हुई और महात्मा गांधी एक झटके में जमीन पर गिर पड़े। बिड़ला हाउस में मौजूद लोगों को लगा कि कहीं पटाखा फूटा है। लेकिन उसके ठीक बाद दूसरी गोली चली। आकाशवाणी से आए लोग अपना तामझाम छोड़कर उस तरफ दौड़े जहां से आवाज आई थी, तभी तीसरी गोली चली और गांधी जी का शरीर सूखे पत्ते की तरह जमीन पर बिखर गया। उनके मुंह से सिर्फ दो शब्द निकले वो थे “हे राम” !

पता चला कि गोली मारने वाले का नाम नाथू राम गोडसे था। उसने खाकी कपड़े पहने थे। गोडसे हट्टा-कट्ठा औसत कदकाठी का नौजवान था, प्रार्थना सभा के लिए मनु और आभा के साथ आ रहे गांधीजी के उसने पहले पैर छुए हाथ जोड़े और उन्हें गोली मार दी। तीसरी गोली चलाने के बाद गोडसे ने दोबारा हाथ जोड़े और वहां से भागा नहीं। लोगों ने गोडसे को पकड़ लिया था, उसने विरोध भी नहीं किया। गोडसे ने जिस रिवॉल्वर से गांधी को तीन गोलियां मारी थीं उसे भी लोगों के हवाले कर दिया।

30 जनवरी से ठीक दस दिन पहले 20 जनवरी को भी बिडला हाउस में मदन लाल पाहवा नाम के एक शख्स ने गांधीजी को चोट पहुंचाने की नीयत से पटाखे फोड़े थे। लेकिन जब प्रार्थना सभा में लोगों ने गांधी को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि जिस किसी ने भी ये कोशिश की हो उसे मेरी तरफ से माफ कर दिया जाए। गांधीजी ने सख्त हिदायत दे रखी थी, कि प्रार्थना सभा में कोई पुलिसवाला मौजूद नहीं रहेगा। लेकिन जब 30 जनवरी 1948 को उन्हें गोली मारी गई तो लोगों ने पुलिस को वहां बुलाया।

गांधीजी को गोली मारने वाले नाथूराम गोडसे को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के डीएसपी जसवंत सिंह और तुगलक रोड थाने के इंस्पेक्टर दसौदा सिंह ने पकड़ा हुआ। गोडसे को तुगलक रोड थाने में ले जाया गया जहां उसके खिलाफ गांधी की हत्या करने की एफआईआर लिखी  गई। पुलिस ने गांधीजी की हत्या की एफआईआर कनॉट प्लेस के एम-56 में रहने वाले नंदलाल मेहता से पूछ कर लिखी।

31 जनवरी 1948 को गांधीजी की अंत्येष्टि हुई। उस दिन दिल्ली की सड़कों पर सिर्फ सिर मुंडाये हुए लोगों के मुंड ही मुंड दिखाई दे रहे थे। हजारों लोगों ने गांधीजी की मौत के गम में अपने सिर मुंडवा लिये थे। गांधीजी की शव यात्रा बिड़ला हाउस से जनपथ, कनॉट प्लेस, आईटीओ होते हुए राजघाट पहुंची।

शव वाहन पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल गमगीन मुद्रा में बैठे थे। उसी वाहन पर गांधी के पुत्र रामदास और देवदास भी थे. इन्होंने ही अपने पिता को मुखाग्नि दी।

 गांधी जी की अंत्येष्टि की सारी व्यवस्था भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर सर राय बूचर कर रहे थे लेकिन आस-पास के सैकड़ों गांवों के हजारों लोग अपने घर से देशी घी लेकर गांधीजी की अंत्येष्टि में पहुंचे थे।

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