26 जनवरी को तिरंगा फहराने से पहले जानें भारतीय ध्वज संहिता के बारे में। तिरंगा फहराने का क्या है सही तरीका ?

रायपुर, 24 जनवरी 2020

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्वज संहिता लागू की गई। किसी भी राष्ट्रीय अवसर पर तिरंगा झंडा फहराने के लिए भारतीय ध्वज संहिता के तहत ही ध्वजारोहण किये जाने के मानक तय किये गए है।

भारतीय ध्वज संहिता 2002 में तिरंगा फहराने के प्रावधान।

 * जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहां से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

* सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।

* झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।


* झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुंह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो। 

* झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।

* फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।

* झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।

* किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।

* झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।

* जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।  

रात में तिरंगा फहराने का अधिकार

भारतीय नागरिक अब रात में भी राष्ट्रीय ध्वज फहरा सकते हैं। इसके लिए शर्त होगी कि झंडे का पोल वास्तव में लंबा हो और झंडा खुद भी चमके। गृह मंत्रालय ने उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल द्वारा इस संबंध में रखे गये प्रस्ताव के बाद यह फैसला किया। इससे पहले जिंदल ने हर नागरिक के मूलभूत अधिकार के तौर पर तिरंगा फहराने के लिहाज से अदालती लड़ाई जीती थी। कांग्रेस नेता जिंदल को दिये गये संदेश में मंत्रालय ने कहा कि प्रस्ताव की पड़ताल की गयी है और कई स्थानों पर दिन और रात में राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के लिए झंडे के बड़े पोल लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। जिंदल ने जून २००९ में मंत्रालय को दिये गये प्रस्ताव में बड़े आकार के राष्ट्रीय ध्वज को स्मारकों के पोलों पर रात में भी फहराये जाने की अनुमति मांगी थी। जिंदल ने कहा था कि भारत की झंडा संहिता के आधार पर राष्ट्रीय ध्वज जहां तक संभव है सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच फहराया जाना चाहिए, लेकिन दुनियाभर में यह सामान्य है कि बड़े राष्ट्रीय ध्वज १०० फुट या इससे उंचे पोल पर स्मारकों पर दिन और रात फहराये गये होते हैं।

कब-कब हुआ िरंगे का अपमान-

 फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के तहत झंडे को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाएगा।

 उसे कभी भी पानी में नहीं डुबोया जा सकता है।

तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहनना भी गलत है।

अगर कोई  कमर के नीचे तिरंगा बनाकर कोई कपड़ा पहनता है तो ये सरासर तिरंगे का अपमान है।

1994 में मिस यूनिवर्स बनने के बाद सुष्मिता सेन ने दिल्ली में एक घोड़ा बग्गी के पीछे तिरंगे को बांध दिया था।

 साल 2000 में इंडियन फैशन वीक के दौरान फैशन डिजाइनर मालनी रमानी पर तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हुआ।

साल 2011 में अभिनेत्री मंदिरा बेदी ने तिरंगे रंगे के बॉर्डर वाली साड़ी पहनी थी, जिसे तिरंगे का अपमान करार दिया गया।

साल 2011 में सचिन तेंदुलकर के खलाफ तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हुआ। उन्होंने तिरंगे रंग वाला केक काटा था।

साल 2011 में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा पर तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हुआ। क्योंकि उन्होंने तिरंग के नजदीक अपने पैर रखे।

साल 2012 में क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान दौरान शाहरुख खान ने उल्टा तिरंगा लहराया था, उनस पर केस दर्ज हुआ।

साल 2014 में मल्लिका सहरावत ने ने तिरंगा पहनकर गाड़ी के बोनट पर फोटो खिंचवाया था, उन पर तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हुआ।

दो दिन बाद हम भारत का 71वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं। हर मकान दुकान, सरकारी प्रतिष्ठान की छत पर तिरंगा लहराता नजर आएगा। लेकिन इस तिरंगे की खातिर भारत के लोगों ने हजारों बलिदान, सैकड़ों कुर्बानियां दी हैं। तब जाकर इस तिरंगे को शान से लहराने और गर्व से सिर ऊंचा कर उसे सैल्यूट करने का गौरव प्राप्त हुआ है।

तिरंगे का इतिहास

7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान चौक में तीन पट्टियों वाले झंडे को पहली बार फहराया गया था। इस झंडे में हरा, पीला और लाल रंग था। तिरंगे के बीच में पीली पट्टी पर वन्देमातरम् लिखा हुआ था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाये गए थे। ये झंडा पहली बार कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में फहराया गया था। पहला झंडा स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था।

1907 में पेरिस में मैडम भीकाजी कामा द्वारा फहराया गया। ये झंडा पहले के झंडे से अलग था। इस झंडे में केसरिया, पीला और हरा रंग था। इसमें ऊपर की पट्टी में सिर्फ एक कमल था और नीचे की पट्टी में सात तारे थे।

22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान झंडे को भारतीय ध्वज के रूप में अपनाया। आजादी के बाद से इसी झंडे को अपनाया जा रहा है, बस चरखे की जगह इसमें सम्राट अशोक के धर्मचक्र को स्थान दिया गया है।

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