भारत के लिए बेहद खास है 31 जनवरी का दिन, इसी दिन मोर को मिला था राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा।

संपादकीय, 31 जनवरी 2020

31 जनवरी 1963 का दिन भारत के लिए बेहद खास दिन है। इसी दिन मोर को भारत के राष्ट्रीय पक्षी का गौरव हासिल हुआ था। भारतीय मोर जिसे पावो क्रिस्टेटस भी कहा जाता है। दक्षिण एशिया के देशी तीतर परिवार का एक बड़ा और चमकीले रंग का पक्षी है। दुनिया के अन्य देशों में मोर को अर्द्ध जंगली पक्षी के रूप में जाना जाता है।

नर मोर मुख्य रूप से नीले रंग का होता है। नर मोर के पंख पर चपटे चम्मच की तरह के नीले रंग की आकृति बनी होती है। रंगीन आंखों की तरह बनी चित्ती को ही लोग मोर पंख कहते हैं। नर मोर की पूंछ की जगह पंख की एक शिखा ऊपर की ओर उठी रहती है जो एख लंबी रेल की तरह दिखाई देती है।

मादा मोर में इस तरह की रंगीन पूंछ या पंखों का अभाव होता है। मादा मोर की गर्दन हरे रंग की हल्की भूरी होती है। मादा मोर ज्यादातर खुले जंगल या खेतों में पाई जाती है।

मोर सांप, छिपकली, चूहे, गिलहरी को खा जाते हैं। जंगल में ये अनाज, बेरीज को भी खाते हैं। मोर की खासियत यह है कि ये हमेशा छोटे-छोटे समूहों में चलते हैं। जंगल में पैदल चलना इन्हें पसंद है औऱ उड़ान भरने की कोशिश से बचते हैं। मोर की आवाज आम पक्षियों से बहुत तेज होती है। मोर की आवाज पिया-ओया मिया-ओ होती है। मानसून से पहले मोर के पुकारने की तीव्रता बढ़ जाती है। वन क्षेत्रों में अपनी तेज आवाज के चलत मोर अक्सर एक शेर की तरह शिकारी को अपनी उपस्थिति का अहसास कराते हैं।

मोर को लेकर 2017 में राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने कहा था कि “मोर कभी सेक्स नहीं करते हैं, बल्कि उसके आंसुओं को चुग कर मोरनी गर्भवती होती है” जस्टिस शर्मा के बयान के बाद हर जगह मोर को लेकर बहस शुरु हो गई थी।

मोर को राष्ट्रीय पक्षी होने के साथ ही ‘संरक्षित प्रजातियों’ में भी शामिल किया जा चुका है।देश में लुप्त होने के कगार पर आ चुके मोर की संख्या कितनी है, इसका कोई आंकड़ा तक उपलब्ध नहीं है। केंद्र सरकार ने वन्यजीव संरक्षण कानून में संशोधन कर मोर के शिकार करने पर पाबंदी लगा दी है। लेकिन मोरों के संरक्षण को लेकर कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाये जा सके हैं। सीमित कर्मचारियों के भरोसे चलने वाला वन विभाग भी देश में मोर के सही आंकड़े उपलब्ध करा पाने में अक्षम रहा है। एक अनुमान है कि देश में मोरों की संख्या एक लाख से अधिक है. 

भारतीय संस्कृति में मोर को कई रूपों में निरूपित किया गया है। अनेक प्रतिष्ठानों, मंदिरों में मोर को आइकन के रूप में इस्तेमाल किया गया है। संस्कृत भाषा में मोर को मयूर कहा जाता है। भारत के मंदिरों, चित्रित कथाओं, पुराणों और काव्यों में, लोक संगीत में मोर को जगह मिली है। हिंदू देवी देवताओं के साथ भी मोर का संबंध जोड़ा गया है। भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय पक्षी मोर ही था, श्रीकृष्ण के मुकट पर मोर का पंख हर वक्त बंधा रहता था। मोर का शिव का सहयोगी पक्षी भी कहा जाता है। स्कंद या मुरुगन के रूप में भी जाना जाता है। बौद्ध धर्म में भी मोर ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। मोर को रूपांकनों, वस्त्रों, सिक्कों, पुराने और भारतीय मंदिर वास्तुकला और उपयोगी और कला के कई आधुनिक मदों में इसका प्रयोग व्यापक रूप से प्रयोग किया गया है।  ग्रीक पौराणिक कथाओं में मोर का जिक्र मूल अर्गुस और जूनो की कहानियों में मिलता है। कुर्द धर्म यजीदी के मेलेक टॉस के मुख्य आंकड़े में मोर के कई रूप दिखाये गये हैं। मोर के रूपांकनों को अमेरिकी एनबीसी टेलीविजन नेटवर्क और श्रीलंका के एयरलाइंस में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया है।

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