श्री किड्स बिरगांव में सिकलसेल रोग निदान शिविर का आयोजन।

रायपुर, 17 सितंबर 2019

श्री रावतपुरा सरकार लोक कल्याण ट्रस्ट के तहत संचालित श्री किड्स ब्रांच बिरगांव में आईसीएसआर के डॉक्टरों की ओर से सिकलसेल रोग निदान शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में आए डॉक्टरों ने श्री किड्स स्कूल के बच्चों के रक्त के नमूने लिये और उन्हें सिकलसेल की जांच के लिए भेजा।

सिकलसेल रोग या सिकल-सेल रक्ताल्पता या ड्रीपेनोसाइटोसिस एक आनुवंशिक रक्त विकार है जो ऐसी लाल रक्त कोशिकाओं के द्वारा फैलता है। । इस रोग से पीड़ित व्यक्ति में लाल रक्त कोशिकाओं का आकार असामान्य, कठोर तथा हंसिया के समान हो जाता है। यह क्रिया कोशिकाओं के लचीलेपन को घटाती है जिससे विभिन्न जटिलताओं का जोखिम उभरता है। यह हंसिया निर्माण, हीमोग्लोबिन जीन में में उत्परिवर्तन की वजह से होता है। जीवन प्रत्याशा में कमी आ जाती है, एक सर्वेक्षण के अनुसार महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा 48 और पुरुषों की 42 हो जाती है।

भारत में राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु व केरल ऐसे राज्य है जहाँ सिकल-सेल जींस की भरमार है। ताजा प्रकाशित शोध सर्वेक्षण आंकड़ों के अनुसार ये सिकल-सेल जींस अन्य जाति-समूहों में भी मौजूद हैं परन्तु इनकी प्रतिशत दर न्यून स्तर तक ही सीमित है।

भारत में भयावह स्थिति यह है कि लगभग इतने के इतने ही लोगों में सिकल-सेल जींस के साथ-साथ एक और खतरनाक, घातक व वंशागत थैलेसीमिया बीमारी के जींस भी मौजूद हैं। बावजूद देश में इस बीमारी के नियंत्रण एवं रोकथाम हेतु कोई कारगर योजना अभी तक नहीं बनाई गई है और यदि है भी तो महज यह एक खाना पूर्ति लगती है। सच तो यह है कि राज्यवार इस बीमारी अथवा सिकल-सेल जींस होने के सही-सही आंकड़े भी आज तक उपलब्ध नहीं हैं। जबकि अन्य देशों में इनके नियंत्रण एवं इलाज हेतु सरकारी एवं गैर-सरकारी स्तर पर अनेक परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं।

इसके नियंत्रण के लिये विवाह पूर्व युवक-युवतियों की रक्त परीक्षण कुण्डली का मिलान जरूरी है तथा कई मायनों में यह लाभदायक साबित होती है। इससे इस बीमारी के संवाहक की पहचान में मदद तो मिलती ही है वहीं कई प्रकार के एड्स जैसे खतरनाक संक्रामक रोगों के संक्रमण होने से बचा जा सकता है। सिकल-सेल बीमारी लिये बच्चे पैदा न हों इसके लिये जरुरी है कि संवाहकों के बीच न तो विवाह होना चाहिए और न ही इनके बीच शारीरिक सम्बन्ध। सन्तान पैदा करने के पूर्व संवाहकों को आनुवांशिक सलाहकार से परामर्श लेना ज्यादा उचित एवं हितकर होता है।

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